धार्मिक नगरी हंडिया में बड़े हर्ष उल्लास से बनाया गया भुजरिया पर्व।

हंडिया। भारत में भुजरिया पर्व युगों से चली आ रही सांस्कृतिक परम्पराओं, प्रथाओं, मान्यताओं, विश्वासों, आदर्शों, नैतिक, धार्मिक तथा सामाजिक मूल्यों का वह मूर्त प्रतिबिम्ब हैं जो जन-जन के किसी एक वर्ग अथवा स्तर-विशेष की झाँकी ही प्रस्तुत नहीं करते, वरन सामाजिक समरसता का संदेश देते हैं।

श्रवण मास के रक्षाबंधन के अगले दिन भाद्रपद कृष्ण पक्ष प्रतिपदा को भुजरिया पर मनाया जाता है।

हंडिया ग्राम में रक्षाबंधन के दूसरे दिन रविवार को भुजरिया पर्व पारंपरिक हर्षा उल्लास के साथ मनाया गया। महिलाएं माथे पर भुजरिया रखकर गीत गाते हुए बैंड-बाजों के साथ नर्मदा नदि की ओर निकलीं। वहां पूजा के बाद भुजरिया का विसर्जन किया गया। इसके बाद सभी ने एक-दूसरे को पर्व की शुभकामनाएं दीं।

युवाओं ने ढोल-ताशों की थाप पर लोकगीत गाए। डंडे लड़ाकर उत्सव मनाया गया। यह पर्व बुंदेलखंड का प्रमुख लोकपर्व है। इसे कजलियों का पर्व भी कहा जाता है।स्थानीय लोगों के अनुसार, जल स्रोतों में गेहूं के पौधों का विसर्जन किया जाता है।

सावन की अष्टमी और नवमी को बांस की छोटी टोकरियों में मिट्टी की तह बिछाकर गेहूं या ज्वार के दाने बोए जाते हैं। इन्हें रोज पानी दिया जाता है। लगभग एक सप्ताह में ये अंकुरित हो जाते हैं, जिन्हें भुजरिया कहा जाता है। सावन में इन भुजरियों को झूला देने की परंपरा भी है। बुजुर्गों के अनुसार, भुजरिया नई फसल का प्रतीक है।

रक्षाबंधन के दूसरे दिन महिलाएं इन टोकरियों को सिर पर रखकर जल स्रोतों में विसर्जन के लिए जाती हैं। कजलियां पर्व प्रकृति प्रेम और खुशहाली से जुड़ा है। यह पर्व गले लगकर बधाई देने और पुरानी रंजिशें भुलाकर भाईचारे का संदेश देता है।

संवाददाता अभिषेक लोधी 8461024523

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