किसी को बसा तो नहीं सकते, लेकिन हटाने की पूरी ताकत वर्तमान के जनप्रतिनिधियों में है।

रामविलास कैरवार

50 करोड़ चाहिए !
भाजपा शासित नगर पालिका को….
घंटाघर क्षेत्र के व्यापारियों से…
इसलिए घंटाघर की 551 दुकान फिर से बिकेगी।

90 साल से दुकानें, दुकानदारों के पास थी।

उस समय की सरकार ने दी थी।

दुकानदार वही रहेंगे, लेकिन उनसे पैसे कलेक्ट रेट पर फिर से लिए जाएं

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किसी को बसा तो नहीं सकते, लेकिन हटाने की पूरी ताकत वर्तमान के जनप्रतिनिधियों में है। 3

एक वीडियो दे रहा हूं जिसमें पूर्व मंत्री कमल पटेल जी और नगर पालिका अध्यक्ष इंटरव्यू दे रहे हैं।
इंटरव्यू पत्रकार मादिक ने किया है।

इंटरव्यू को सुनिए! मैंने भी सुना है।

इंटरव्यू में जो सुनाई दे रहा है उस बात को मैं यहां लिख रहा हूं।

हरदा शहर के घंटाघर के पास 551 दुकान लगभग 90 साल से लीज पर चल रही है।
जब हम (वर्तमान पीड़ी) पैदा नहीं हुए थे, तब उन दुकानों का स्वामित्व, दुकानदारों को दिया गया था।
तत्कालीन सरकार ने।

इन्हीं दुकानदारों को फिर से दुकान बेचने की प्लानिंग नगर पालिका ने की है।

नाम दिया है, दुकानदारों को लीज की जगह स्वामित्व दिया जा रहा है।

बात वही है, जिस जगह पर वे 90 साल से रह रहे हैं, उसी जगह को अब नगर पालिका फिर से बेचेगी।
नाम बदलकर।

जब मैं खबर लिख रहा हूं, तब इस पर भी सवाल उठेंगे?
हम बेच नहीं रहे हैं?
हम तो स्वामित्व दे रहे हैं!
लेकिन स्वामित्व तो दुकानदारों के पास पहले से है।
अब उनसे लाखों रुपए वसूलने की तैयारी की जा रही है।

क्योंकि सत्ता के सामने सब नतमस्तक है। जिला प्रशासन से अनुमति ले ली है।

सरकार बीजेपी की है ।
और नगर पालिका भी बीजेपी की है। इसलिए कलेक्टर से भी अनुमति मिल चुकी है।

इंटरव्यू में पूर्व मंत्री जी बोल रहे हैं, कलेक्टर से अनुमति मिल गई है।

अगर इसी तर्ज पर शहर के अन्य हिस्से भी बिकने लगे,तो हरदा शहर की सिंधी कॉलोनी भी बिक सकती है।

उनका रिकॉर्ड भी खंगालिए, घंटाघर की दुकान की तरह ही उनके पास स्वामित्व है। यहां के रहने वाले लोगों को भी सरकार ने ही बसाया था।

नजर अभी घंटाघर की दुकानों पर है, बाकी हिस्सों की बारी कब तक आएगी इंतजार कीजिए।

क्योंकि पैसा चाहिए ?

घंटाघर क्षेत्र की दुकान फिर से बिकेगी, इस सूचना के बाद मैंने यहां के दुकानदारों से बात की ।
दुकानदार डरे हुए हैं।
और रो भी रहे हैं।

एक दुकानदार जो अग्रवाल परिवार का है, उसका इंटरव्यू सुनिए ! क्या बोला उसने…

उसने कहा- मेरे परदादा को यह दुकान मिली थी ! जो किराने की दुकान हम चला रहे हैं!
फिर दादा जी ने दुकान की ।
इसके बाद पिताजी ने दुकान की।
और अब मैं दुकान कर रहा हूं।
मेरे बाद मेरा बेटा दुकान पर बैठने लगा है।

पांच पीढ़ी इस किराना बाजार की दुकान पर, स्वामित्व की तरह बैठते रहे हैं।
स्वामित्व के नाम पर हमारे पास सरकारी रिकॉर्ड है।

जो किराया नगर पालिका तय करती है उसे हम हर साल भुगतान करते हैं।
90 साल से करते आए हैं।

उसको कल पता चला कि, उसकी दुकान पर,उसे बने रहने के लिए फिर से पैसा देना पड़ेगा !
तब दुखी हो गया।

ऐसी स्थिति सभी दुकानदारों की है! जिनको, दादा, परदादा, दुकान देकर गए थे।
90 साल पहले की सरकार उनको देकर के गयी थी ।

उन दुकानदारों को फिर से दुकान रखने के लिए लाखों रुपए का भुगतान करना पड़ेगा !
या फिर हटना पड़ेगा।

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