हंडिया। पावन नर्मदा तट पर स्थित नेमावर से प्रारंभ हुई पंचकोशी परिक्रमा अमावस्या के पावन अवसर पर श्रद्धा, आस्था और उल्लास के साथ संपन्न हो गई।

शुक्रवार ग्यारस को शुरू हुई यह धार्मिक यात्रा विभिन्न पड़ावों से होती हुई पुनः नेमावर पहुंची, जहां हजारों श्रद्धालुओं ने मां नर्मदा में स्नान कर विधिवत पूजा-अर्चना के साथ परिक्रमा का समापन किया।तय पड़ाव बदला, श्रद्धा का प्रवाह नहीं थमायात्रा का पहला विश्राम बिजल गांव करोंद माफी स्थित करुणा धाम आश्रम में हुआ। दूसरा पड़ाव छीपानेर और तीसरा करताना रहा। कार्यक्रम अनुसार चौथा विश्राम ग्राम नादरा में प्रस्तावित था, लेकिन श्रद्धालुओं के उत्साह और तेज गति के चलते जत्था सीधे हंडिया पहुंच गया।

यहीं चौथा विश्राम हुआ—और यहीं व्यवस्थाओं की असल तस्वीर सामने आ गई।कीचड़, गंदगी और अधूरी तैयारीग्राम पंचायत द्वारा पूर्व में साफ-सफाई, पेयजल, प्रकाश और विश्राम स्थल की समुचित व्यवस्था के दावे किए गए थे, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही नजर आई। श्रद्धालुओं को कई स्थानों पर कीचड़ और गंदगी से होकर गुजरना पड़ा। पर्याप्त रोशनी नहीं होने से रात्रि विश्राम के दौरान असुविधा हुई, वहीं पेयजल की कमी भी महसूस की गई।

आस्था के इस महापर्व में अव्यवस्थाओं ने श्रद्धालुओं को निराश किया और पंचायत की तैयारियों पर सवाल खड़े कर दिए। कई यात्रियों ने कहा कि “श्रद्धा में कमी नहीं थी, लेकिन व्यवस्था में जरूर कमी रह गई।
”भक्ति में डूबा रहा मार्गयात्रा मार्ग “नर्मदे हर” के जयकारों, भजन-कीर्तन और ढोल-नगाड़ों की गूंज से भक्तिमय बना रहा। जगह-जगह ग्रामीणों ने जलपान व प्रसाद वितरण कर यात्रियों का स्वागत किया। अमावस्या के दिन नेमावर पहुंचकर श्रद्धालुओं ने मां नर्मदा में स्नान कर विशेष पूजा-अर्चना की और सुख-समृद्धि की कामना की।
प्रशासन के लिए संदेशस्थानीय नागरिकों और श्रद्धालुओं ने मांग की है कि भविष्य में पंचकोशी यात्रा जैसे विशाल धार्मिक आयोजनों में प्रशासन और पंचायत स्तर पर ठोस एवं पूर्व नियोजित व्यवस्थाएं सुनिश्चित की जाएं। विशेष रूप से साफ-सफाई, चिकित्सा सुविधा, पेयजल, सुरक्षा और रात्रि विश्राम की समुचित व्यवस्था अनिवार्य रूप से की जाए।
पंचकोशी परिक्रमा भक्ति और आस्था के साथ संपन्न हो गई, लेकिन हंडिया में उजागर हुई व्यवस्थागत कमियां प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के लिए एक चेतावनी भी छोड़ गई हैं। अब देखना होगा कि अगले आयोजन से पहले इन सवालों के जवाब मिलते हैं या फिर आस्था यूं ही व्यवस्थाओं की परीक्षा लेती
